DSSSB · Hindi

गद्यांश: उपभोक्तावादी संस्कृति ने मानव सभ्यता के समक्ष अनेक गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संपत्ति, संचय और भोग की प्रवृत्ति ने अकूत धनकुबेरों को पैदा किया तो दूसरी तरफ ऐयाश इलीटों को। एक तरफ दुनिया जादुई विकास के जाल में उलझती जा रही है। दूसरी तरफ दुनिया का बड़ा हिस्सा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी महरूम है। रोटी, कपड़ा और मकान अब जुमला बनकर रह गया है। बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर शिक्षा के लिए संघर्ष अभी जारी है। बाजार की चकाचौंध में सम्मान गिरवी है। नारी अस्मिता संकटपूर्ण है। बच्चों का बचपन असुरक्षित और कलंकित है। संवेदनाओं के लिए जगह नहीं बची है। अजीब सी आँधी चल रही है, पूरी दुनिया उसमें उड़ी जा रही है। किसी के पास रुककर सोचने की फुरसत नहीं है कि आखिर हम कहाँ जा रहे हैं। जो थोड़े से लोग सोचने की सामर्थ्य रखते हैं, वे भी व्यवस्था के दबाव के चलते, समय के प्रवाह में बहुत कुछ कर नहीं पा रहे हैं। समय की चक्की ऐसी चल रही है, विकास का पहिया ऐसा घूम रहा है कि हम उसी की गति से चलने के लिए बाध्य हैं। प्रश्न: 'संचय' का अर्थ है -1602

  1. मितव्यय
  2. अपव्यय
  3. संकलन
  4. व्यय
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